श्री दादू अनुभव वाणी – दया निर्वैरता का अँग २९

15 Jul
2017

श्री दादू अनुभव वाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान
दया निर्वैरता का अँग २९

अदया हिंसा – वनस्पतियों में जीव भाव
दादू सूखा सहजैं कीजिये, नीला भानैं नाँहिं ।
काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब माँहिं ॥ १९ ॥

१९ में कहते हैं, वनस्पतियों में जीव है अत: उनका तोड़ना हिंसा है । सूखे दांतुन को ही शनै: – शनै: मुख में चबाकर दांत साफ कर लेने चाहिये, हरा नहीं तोड़ना चाहिये । सभी वनस्पतियों में जीव रूप से परमात्मा स्थित है । अत: किसी को भी दु:ख नहीं देना चाहिये ।
ईडवा ग्राम में हरा दांतुन लाने पर दूजनदासजी को यह १९वीं साखी कही थी । प्रसंग कथा – दृ – सु – सि – त – ७ । ११९ में देखो।

दया निर्वैरता
घट घट के उनहार सब, प्राण परस ह्वै जाइ ।
दादू एक अनेक ह्वै, बरते नाना भाइ१ ॥ २० ॥

२० – २५ में दया निर्वैरता के विचार दिखा रहे हैं, प्राणधारी जीव – चेतन जब शरीरों में प्रविष्ट होता है तब वह प्रत्येक शरीर की आकृतति जैसा ही भासने लगता है=हाथी में हाथी जैसा महान्, चींटी में चींटी जैसा लघु दीखता है । इस प्रकार एक ही जीवात्मा अनेक होकर नाना भावों१ द्वारा सँसार में व्यवहार करता है
॥ दादूराम सत्यराम ॥

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