श्री स्वामी दादूदयालजी महाराज की वाणी

14 Jun
2017

|| महिमा – महात्म्य ||
|| दोहा ||
प्रगट कल्प तरु अवनि परि, उदय भयो इक आय |
कृतसु दादूदास को मनवांछित फल दाय || १ ||

|| कवित्त ||
अवनि कल्प तरु प्रगट, भई दादू की वाणी |
साखी शब्द दोई ग्रन्थ, सुतो बड़ स्कन्द पिछाणीं ||
साखी स्कन्द में डारि, अंग सैंतीस सुनाऊँ |
पद स्कन्द में डारि, सप्त अरु बीस बताऊँ ||
पच्चीससै पैंसठि साखि, सोउ पुनि साखा |
चार सैं चंव्वालीस, पद सोउ उपदाखा ||
पत्र अक्षर लक्ष कहै साठि, सहज पुनि और गनि |
भक्ति पहुप वैराग्य फल, ब्रह्म बीज जगन्नाथ भनिं || २ ||
प्रथम सत्ताईस राग पोई, अब मोटी डारा |
तामैं छोटी और अंग, सैंतीस बिचारा ||
पद जू चंव्वालीस चारि, सत ऊपर डलियाँ |
उभय सहस शत पंच, साखी इकतीस दुकलियाँ ||
अब पात सो अक्षर एक लख, साठ सहस पुनि और गन |
भक्ति पहुप अरु दर्श फल, ब्रह्म बीज कहै लालजन || ३ ||
ज्ञान भक्ति वैराग्य भाग, बहु भेद बतायो |
कोटि ग्रंथ को मन्त, पन्थ संक्षेप लखायो ||
विशुद्धि बुद्धि अविरुद्धि, शुद्धि सर्वज्ञ उजागर |
परमानंद प्रकाश नाश, बिगडंद महाधर ||
वर्णबूँद साखी सलिल, पद ललिता सागर हरि |
दादूदयालु दिनकर दुती, जिन विमल वृष्टि वाणी करी || ४ ||

|| चौपाई ||
भये सम्पूर्ण पद अरु साखी, भक्ति मुक्ति तिनमें सो भाखी |
मनसा वाचा बाचै कोई, ताकूँ आवागमन न होई ||५||

|| दोहा ||
वाणी दादू दयालु की, सब शास्त्रन को सार |
पढे विचारे प्रीती सूं, जे जन उतरे पार || ६ ||
दादू दीन दयालु की, वाणी विस्वावीस |
तिनकूं खोजि विचार करि, अंग धरे सैंतीस || ७ ||
तिन माहीं जो हारडे, तिनके तिते स्वरुप |
कोई विवेकी केलवे, काढै अर्थ अनूप || ८ ||
वाणी दादू दयालु की, वाणी कंचन रूप |
कोई इक सोनी संत जन, घड़ि हैं घाट अनूप || ९ ||
वाणी दादू दयालु की, वाणी अनुभव सार |
जो जन या हृदय धरै, सो जन उतरे पार || १० ||
जे जन पढ़े जी प्रीति सूं, उपजे आत्मज्ञान |
तिनकूं आनन भास ही, एक निरंजन ध्यान || ११ ||
जिनके या हृदय बसी, याही में मन दीं |
तिनकूं अति मीठी लगी, आठ पहर लैलीन || १२ ||
वेद पुराण सब शास्त्र, और जीते जो ग्रन्थ |
तिनको बोध बिलोइकै, यह काढ्या निज मंथ || १३ ||
बोले दादू दासजी, साचै शब्द रसाल |
तिनकी उपमा को कहै, मानो उगले लाल || १४ ||
या वाणी सुनि ज्ञान ह्वे, याही तै वैराग्य |
या सुन भजन भक्ति बढ़े, या सुन माया त्याग || १५ ||
या वाणी पढ़ि प्रेम ह्वे, या पढ़ि प्रीति अपार |
या पढ़ि निश्चय नाम की, या पढ़ि प्राण अधार || १६ ||
या पढ़ि कूँ खोजतां, क्षमा शील संतोष |
याही विचारत बुद्धि ह्वे, या धारत जिव मोक्ष || १७ ||
आदि निरंजन अन्त निरंजन, मध्य निरंजन आदू |
कहि जगजीवन अलख निरंजन, तहाँ बसे गुरु दादू || १८ ||
बषना वाणी बरसणी, बरसो गहर गंभीर |
सूकानैं हरिया करे, गुरु वाणी का नीर || १९ ||
अविचल मंत्र जपे निशि वासुर, अविचल आरती गावै |
अविचल इष्ट रहै शिर ऊपरि, अविचल ही पद पावै || २० ||

दादू वाणी के अंग नाम
गुरु मिल सुमिरण सों लागा, बिरहा जब आया |
परचा पिवजी सों भया, जरना ठहराया || १ ||
हैरान देख लय लग रही, निहकर्मी पतिवन्ता |
चिंतामणि मन को भई, सूक्ष्म-जन्म अनन्ता || २ ||
माया त्यागी, साँच गहि, भेख रु पंथ निराल्रे |
साध अंग सब सोध कर, मध मारग चालै || ३ ||
सारगृही जू विचार कर, विश्वास हरि दीया |
पीव पिछाना आपना, समरथ सब कीया || ४ ||
सब्द सुना श्रवणों धरा, जीवत मिरतक हूवा |
सूरातन साहस किया, अरु इन्द्रिय मूवा || ५ ||
कालहि मेट सजीवनी, पारस घर आया |
उपजन, दया, निर्वैरता, सुंदरि पिव पाया || ६ ||
कस्तूरी की बॉस ले, निन्दा परिहरिये |
निगुणा नेह निवार कर, हरी बिनती करिये || ७ ||
साखीभूत बेली बधी, अबिहड़ अंग लागा |
अमर भये अरु थिर हुवै, हरि-संगति पागा || ८ ||
दादू दीनदयाल की, बानी बिस्वाबीस |
सकल अंक सो सोध कर, अंग धरे सैंतीस || ९ ||
इन सैंतीसों अंग में, परमारथ गाया |
‘महानन्द’ मुक्ता भया, गुरु दादू पाया || १० ||


दादू वाणी के राग नाम

राग विविध बहु शोध कर, हरि का गुण गाया |
साध महामुनि जे भये, परमेश्वर पाया || १ ||
प्रथम गौड़ी मालवा, कीया कल्याना |
कनड़ा अड़ाणा आण कर, केदार ठाना || २ ||
मारू रामकली भली, आशावरि सिन्धूडा |
देवगन्धार कलिंगडा, परजिया पाया || ३ ||
भाणमली गायन रली, सारँग सार टोड़ी |
हुसैनी बंगाली गावताँ, ऐसे मन होडी || ४ ||
नटनारायण सोरठी, गुंड प्रेम अपारा |
बिलावल सोहे सदा, सोहे रस सारा || ५ ||
बसंत भैरूं ललिता भनी, जैतश्री सवाई |
धनाश्री और अनन्त की, मिल आरति गाई || ६ ||
आदि अंत हरि सेवही, मिल सबही साधू |
इन रागन में पद किये, श्री सतगुरु-दादू || ७ ||
अंग-रागन का जोड़ यह, महानन्द गाया |
गुरु-दादू परसाद तैं, हरि हिरदै पाया || ८ ||

मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरञ्जनं, नमस्कार गुरु देवत: |
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
परब्रह्म परापरं, सो मम् देव निरंजनम् |
निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनम् ॥ 2 ॥
गुरुब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्व र: |
गुरु: साक्षात् परंब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नम:॥ 3 ॥
अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरं |
तप्तदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नम:॥ 4 ॥
केशराम्बरधरं स्वामी, नूर तेज सुधामयम् |
दादू दयालु दया कृत्यं, सर्व विघ्न विनाशन् ॥ 5 ॥
काश्मीर रंजितं वस्त्रं, गौरवर्णं शशीप्रभम् |
दधानं श्रीगुरुंदादूं, वंदे कारण विग्रहम् ॥ 6 ॥
जो प्रभु जग में ज्योतिर्मय, कारण करण अभेव |
विघ्न हरण मंगलकरण, श्री नमो निरंजन देव ॥ 7 ॥
स्वामी दादू सुमिरिये, गहिये निर्मल ज्ञान |
मनसा वाचा कर्मणा, सुन्दर धरिये ध्यान ॥ 8 ॥
स्वामी दादू ब्रह्म है, फेर सार नहिं कोय |
सुन्दर ताकों सुमिरतां, सब सिध कारज होय ॥ 9 ॥
स्वामीजी सिर ऊपरे, स्वामीजी उर मांहि |
स्वामी दादू सारिसा, सुन्दर दूजा नाहिं ॥ 10 ॥
स्वामी दादू दीनदयाल सा, नजर न आया कोय |
घडसी सारी मांड में, कर्ता करे सो होय ॥ 11 ॥
सब संतन सौं बीनती, जे सुमिरें जगदीस |
हरि गुरु हिरदै में, बसो और हमारे शीश ॥ 12 ॥
हरि वन्दन गुरु रीझहीं, गुरु वन्दन सुख राम |
जगन्नाथ हरि गुरु खुशी, करियो जन परनाम ॥ 13 ॥
सदा हमारे रामजी, गुरु गोविंदजी सहाय |
जन रज्जब जोख्यों नहीं, विघ्न विलय होय जाय ॥ 14 ॥
नाम लेत नव ग्रह टरें, भजन करत भय जाय |
जगजीवन अजपा जपें, सबही विघ्न विलाय ॥ 15 ॥
विघ्न बचें हरि नाम सौं, व्याधि विकार विलाय |
ऐसा शरणा नाम का, सब दुख सहजैं जाय ॥ 16 ॥
🌷दादूराम सत्यराम🌷

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